Saturday, December 7, 2013

गर्म साँसों की महक से सराबोर हुआ मैं 
उलझ आँचल में उनके कमजोर हुआ मैं 

आया गिरफ्त में जब हाल ए दिल उनका 
हटा कर परदे हया के कुछ और हुआ मैं

खेल कर बल खाती घटाओं से काली 
एक माहजबीं के चित का चोर हुआ मैं

थम जाएँ चाहत के लम्हें सदा के लिए 
दस्त ए दुआ को खुदा की ओर हुआ मैं

रिश्तों में रिश्तों का सिरमोर हुआ मैं
अटूट बंधन को विश्वास की डोर हुआ मैं....अंजना

3 comments:

  1. वाह बहुत सुन्दर ग़ज़ल है बधाई

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    1. पसंदगी के लिए आभार नील जी

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  2. जी शुक्रियाँ

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