गर शब्दों की मुझपे मेहरबानी हुई
मैं अशरार मुकम्मल कह जाउंगी
जो हुई तल्ख़ अंदाज ए बयांबाजी सी
तो मैं भी भावनाओं संग बह जाउंगी
है गर पाकीजा इश्क ए दस्तूर जुदाई
तेरे वास्ते दर्द यह भी मैं सह जाउंगी
जो इशारा मिला हसरत ए पनाह को
बन ख़्वाब पलकों में तेरी रह जाउंगी
ना कुरेद ये बीते लम्हे जख्म देते हैं
आह तड़प रेजा रेजा मैं ढह जाउंगी
मैं अशरार मुकम्मल कह जाउंगी
जो हुई तल्ख़ अंदाज ए बयांबाजी सी
तो मैं भी भावनाओं संग बह जाउंगी
है गर पाकीजा इश्क ए दस्तूर जुदाई
तेरे वास्ते दर्द यह भी मैं सह जाउंगी
जो इशारा मिला हसरत ए पनाह को
बन ख़्वाब पलकों में तेरी रह जाउंगी
ना कुरेद ये बीते लम्हे जख्म देते हैं
आह तड़प रेजा रेजा मैं ढह जाउंगी
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