पल दो पल
जीवन में हर पल अनमोल होता है उन्ही अनमोल पलों में से कुछ पल हमारे लिए निकालें यही गुजारिश है
Wednesday, January 28, 2015
दिल आशिकाना और दिमाग शायर का
मैं गजलों के सिवा दूँ भी तो क्या दूँ तुझे
तिलिस्म सी लगती है ये जिंदगी
जिसे चाहते हैं वो मिलता नहीं है
चाहतों को अपना बनाएं कैसे
कहने को फ़क़त हौसला नहीं है
अजनबी को अपना बना लेते हैं हम
वो जानकर भी अपना कहता नहीं है
दिल खोलकर रख देते हैं हम
वो भावनाओं में बहता नहीं है
बनू सुहागन हसरत ये थी
होता कोई हादसा ही नहीं है
सर्द रातों का रिश्ता है मुफलिसी से
सोता है फुटपाथ पर छत की कमी से
जलता चिराग कोई बुझाता नहीं हैं
अपने हाथ अपना घर जलाता नहीं है
नदियों में बहते आसमां को ना देखो
नज़ारा कोई इतना भरमाता नहीं है
असंख्य है तारे संग एक चंद्रमा के
वो किस्मत पे अपनी इठलाता नहीं है
पपीहा क्यों प्यासा स्वाति नक्षत्र को
खुद समंदर खजाने लुटाता नहीं है
वो छुपाने को कुछ भी छुपता नहीं है
नज़रे जताती, लब पे आता नहीं है
लौटा रहे हैं दिल को लेने के बाद
बेगाना कर दिया अपना कहने के बाद
कलम की जुम्बिश पर ना कर मेरा सर कलम
ख़बरों के कारोबार में बता खामोशी की रकम.
सुलग रहा है कोई दिन में कड़ी धूप बनकर
पिघल रहा है रातों को शबनमी ओस बनकर
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