Wednesday, January 28, 2015

जलता चिराग कोई बुझाता नहीं हैं
अपने हाथ अपना घर जलाता नहीं है
नदियों में बहते आसमां को ना देखो
नज़ारा कोई इतना भरमाता नहीं है
असंख्य है तारे संग एक चंद्रमा के
वो किस्मत पे अपनी इठलाता नहीं है
पपीहा क्यों प्यासा स्वाति नक्षत्र को
खुद समंदर खजाने लुटाता नहीं है
वो छुपाने को कुछ भी छुपता नहीं है
नज़रे जताती, लब पे आता नहीं है

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