जलता चिराग कोई बुझाता नहीं हैं
अपने हाथ अपना घर जलाता नहीं है
अपने हाथ अपना घर जलाता नहीं है
नदियों में बहते आसमां को ना देखो
नज़ारा कोई इतना भरमाता नहीं है
नज़ारा कोई इतना भरमाता नहीं है
असंख्य है तारे संग एक चंद्रमा के
वो किस्मत पे अपनी इठलाता नहीं है
वो किस्मत पे अपनी इठलाता नहीं है
पपीहा क्यों प्यासा स्वाति नक्षत्र को
खुद समंदर खजाने लुटाता नहीं है
खुद समंदर खजाने लुटाता नहीं है
वो छुपाने को कुछ भी छुपता नहीं है
नज़रे जताती, लब पे आता नहीं है
नज़रे जताती, लब पे आता नहीं है
No comments:
Post a Comment