Sunday, September 15, 2013

मेरी आँखें मेरे दिल का दर्पण हैं 
मेरा सब कुछ तुझ पर अर्पण है 
डोर है विश्वास की और इसके सिवा कुछ भी नहीं 
अनजाने से इस रिश्ते को ये मेरा कैसा समर्पण है
चंद पुराने ख़त जो आये हाथों में , बीते कल की आज से बात हुई 
घिर आये यादों के बादल घनेरे , और फिर जम कर बरसात हुई 
सारी यादें जी लीं कुछ पल में , पिंघल गया इन आँखों का संयम 
बाँध टूट गया फिर मन का , उन्मादी पानी को रोक ना पाए हम.
रात के सायों में हम नज़र आते नहीं 
किसी से इतनी नजदीकी हम जताते नहींकल के छोटे छोटे टुकड़े यादों में महफूज हैं कुछ इस तरह 
चुराया था वक़्त से उन चन्द हसीन लम्हों को जिस तरहइंसान ने ऐसी दूरबीन बना डाली 
गर्भ में ही कन्या मिटा डाली 
क्रूरता की हद नापेंगे कहाँ तक 
जब जन्म देने वाले ने ही जान ले डालीख्वाबों में दावतों का मज़ा हमने लिया 
खाली पेट नींद भी भला आती क्यों नहींआंसुओं को थामा नहीं पलकों की कोर पर 
भर गया धरती और आकाश ओर छोर पर.नक्स बड़ा पर अक्स है छोटा 
दायरों में सिमटने लगे हैं बड़े लोगना हारने का खौफ है ना जान जाने की फिकर 
जिंदगी की दौड़ में खुद को मैं ले जाऊं कहाँ .आँधियों से हमें खौफ नहीं सन्नाटों ने मारा है 
हमने तो हर मुसाफिर को लहर लहर पार उतारा है
हाँ मैं एक कश्ती हूँ यह सच है 
मैं जिसमें बहती हूँ तू वही एक धारा हैरोका है बहुत खुद को अश्कों को पिया मैंने 
जिंदगी का लम्हा लम्हा यूँ ही है जिया मैंने.
मैंने तो शायरी के गुलदस्ते में फ़क़त कांटे ही बोये थे 
तुमने जो छुआ कांटो को वो फूल बन कर खिल उठे
शब्दों के समंदर में तुम क्यों इस कदर खो जाते हो
कभी आते हो उथले पानी में नज़र कभी गहरे डूब जाते हो
जिंदगी का हर रंग भाया है हमें 
तेरी बेरुखी ने भी लुभाया है हमें.
मैं इस छोर पर हूँ तुम उस छोर पर हो 
जुड़े हैं कुछ यूँ जैसे आँसू पलकों की कोर पर हों.
मेरी सोच की आवारगी कम ना थी 
वहीँ पहुँच जाती है जहाँ मेरा कोई सरोकार नहीं
वो बिन परों के उड़ना सिखा गया 
एक अल्ल्हड़ को शर्माना सिखा गया 
छोड़ कर जब चल दिया चंद पलों में 
रुसवाइयों संग जीना तड़पना सिखा गया
जुल्फों की कैद से निजात कभी कोई पाता नही 
सुरूर-ए-ज़ुल्फ़ से कभी कोई बच पाता नही 
हुस्न बेमिसाल से नफस-नफस मुअत्तर 
इस कैद से आज़ाद कभी कोई हो पाता नही..
जिंदगी से जिंदगी बचाते कब तक ,
साथ रहते हों दूर बताते कब तक
तारों की छाँव में टहलना मुश्किल 
बिन चांदनी को देखे दिल बहलना मुश्किल 
तारों को देख खिल जाता है मन 
साथ होकर भी तन्हाई में जीना मुश्किल
रहती हूँ पास समंदर के पर फिर भी हूँ प्यासी 
बूँद बूँद सी इस जिंदगी से जाती नहीं उदासी 
ये अफ़साना ये फ़साना ये किस्सा पुराना 
अब छोड़ भी दो यूँ मेरे दिल में आना जाना 
चले जाओ या बस जाओ यहीं सदा के लिए 
अब नहीं रास आता है यूँ बार बार तडपाना
जिंदगी एक मदरसा सी 
पग पग सीख दे जाती है 
गुनी गुण लेता है ठोकरों से भी 
कठिन डगर भी सरल हो जातीं है
बहा शहीदों का खून हम गुलामी से आजाद मिले 
छूटे गम हरियाली छाई हम खुशियों से आबाद मिले
आँखों के इर्द गिर्द हैं मेरी यादों के सिलसिले 
कुछ बीते हुए लम्हें कुछ गुजरे हुए जलजले
तन्हाइयों में बीती बातें दिल चीर जाती हैं 
चाहा था जिन्हें शिद्दत से वो क्यूँ नहीं मिले