Sunday, March 3, 2013

सावन बीत गया मेरा सूखा सर्द रात कटी तन्हाई में 
मान भी जाओ सजना मेरे नहीं रखा कुछ रुसवाई में 
ले बरात आओ मेरे अंगना मुझ संग व्याह रचाने को 
इस बसंत जीवन के हसीं रंग खिला जाओ शहनाई में
क्यों सच्ची मुहब्बत को झुठलाते हो 
चाहत में दीवाने हो फिर भी बात बनाते हो 
दिल के रिश्ते यूँ भुलाए नहीं जाते समझ लो 
क्यों झूठी दिलासा से दिल को समझाते हो.
जिंदगी तो जी तमाम पर कभी खिलखिलाई नहीं 
आज से पहले कभी मैं मुहब्बत ए आबशार में नहाई नहीं

कहानी मुहब्बत की लिखने को तरसती रही उम्र भर 
पर लिख सके जो मुहब्बत मेरे पास वो रोशनाई नहीं 

धड़कने बढ़ी इतनी के जज्बात काबू रह ना सके 
करने को इजहार ए इश्क हाथों ने कलम उठाई नहीं 

मेरा हौसला भी जालिम जमाने के आगे टूट गया 
मुझ पर आज तक थी किसी ने तोहमत लगाईं नहीं

कहने को इस शहर में मेरे दीवानो की तादाद बहुत है
पर मेरी जिंदगी में मुझसे किसी ने वफ़ा निभाई नहीं

यूँ तो तलबगार बहुत हैं ‘महक’ पर हक़ जमाने के लिए
मेरी चाहत में दुनिया भुला दे जो मिली वो रहनुमाई नहीं

इंतज़ार ए वफ़ा में मुद्दतों से बीमार हो रही हूँ मैं
मेरी उम्मीदों की खूबसूरत फसल लहलहाई नहीं 
जिंदगी से जिंदगी बचाते कब तक ,
साथ रहते हों दूर बताते कब तक ..
इम्तेहा हो गयी है दौर ए इम्तहान की 
काश हो जाती सरल डगर मुकाम की.
अहसास में उतर जाते हैं जो तन्हाई उन्हें फिर सताती नहीं है 
रूह के रिश्तों से बंध जाते हैं जो मौत उन्हें फिर डराती नहीं है..
यादें सहारा हैं अकेलेपन को झुठलाने का 
यादें सहारा हैं मेरे खालीपन मिटाने का 
मैंने कुछ यादों को संजो लिया क्योंकि 
ये सहारा हैं तन्हाई में तेरे साथ गुज़र जाने का...
अहसास तौल कर भी गूंगा बोले कैसे 
कोई और उसके अहसास तौले कैसे 
यूँ तो अहसास बहुत हैं जिंदगी में साज बहुत हैं 
बिन कही हर बात को समझ कर भी हम नासमझ होले कैसे ..
इश्क ना हुआ जैसे मौस्मीं बाजार हो गया 
बेगानों की बस्ती में हर कोई खरीदार हो गया 

हर जगह निकल पड़ी फूल बेचने वालों की चांदी 
दिल बिन खुशबू के फूलों का तलबगार हो गया

तड़प रहे हैं सब यहाँ दिल के मारे सितमगर
दिल का मरीज कोई ना था पर बीमार हो गया

सूरत देख दिल की सीरत समझ आ जाती है
दिल ना हुआ जैसे दिलों का व्यापार हो गया


दुश्मनी क्या खूब निभा रहें हैं आपस की दोस्ती में
दो दिलों को मिलाने हर दोस्त भी मददगार हो गया

दूर की सोच रख चिल्ड्रन डे भी क्या इजाद किया गया
वेलेंटाईन डे के नौ माह बाद चिल्ड्रन डे का दीदार हो गया

अंग्रेजी सभ्यता का भूत दीवानों पर सवार हो गया
बसंत मधुमास की जगह वेलेंटाइन का उदगार हो गया.
मेरी पलकों से अश्कों का सैलाब बहा 
खुद के अहसास से सबको भिगो डाला यारों
जरूरी नहीं कोई दिन हो ख़ास मिलने के बहाने के लिए 
आ जाओ फुर्सत ए लम्हे में एक हसीं शाम बिताने के लिए 
आ जाओ मेरे जीवन में मिसाल ए मुहब्बत बन कर 
छा जाओ मेरे जीवन में खुदा की रहमत बन कर 
हर रंग फीका है हिना के रंग के आगे 
सज जाओ मेरे हाथों में रंग ए हिना बन कर ...
आज फिर तेरी याद मेरी तन्हाई पर हावी है !
बीते लम्हों को अपने शब्दों में पिरोया मैंने !!

तनहा छोड़ मुझे बेवफाई निभाई तुमने यूँ ही 
लिख लिख कर नाम तेरा हर बार धोया मैंने !!

उन निशानियों में ढूंढती हूँ तुमको मैं शौक से
तभी साजो सामाँ हिफाजत से संजोया मैंने !!

तुम नहीं तो जीने की आरजू नहीं रही मुझमे
कुछ पल तेरी यादों में खुद को भिगोया मैंने !!

बड़ी मुद्दतों के बाद जिसे पाया था उसे खोया मैंने !

गम ए जुदाई में हर बार अश्कों में डुबोया मैंने !
चाहत के नाम पर मैं आज घर से बेघर हुआ 
फिर भी मुझे उसका प्यार मयस्सर नहीं हुआ 

यूँ तो लुटा दिया सब कुछ आशिकी के नाम 
मुकाम ए मुहब्बत फिर भी मेरा बेहतर नहीं हुआ 

सूना था आशिकी में दिल दुनिया को भुला देते हैं 
मेरी जिंदगी में भूलना भुलाना अक्सर नहीं हुआ 

मुहब्बत में एक दूजे की धड़कन सुनाई देती है 
सुनते हैं लोग फ़रियाद मेरी पर असर नहीं हुआ

तेरे साथ बीते पलों से रौशन मेरा जहां था कभी
रूठने पर तेरे सूरज मेरा कभी रहबर नहीं हुआ 
चल पड़े हो सफ़र पर मुझको ना भुला देना 
दिल की दौलत को तुम यूँ ही ना लुटा देना

आईने में भी सूरत ए यार नज़र आता है 
अक्स नज़रों से हटाकर यूँ ही ना दगा देना

तेरे प्यार की एक लौ जल उठी है मेरे जीवन में 
बुझाने को इस दिए को तुम यूँ ही ना हवा देना

ये दर्दे दिल तेरे इश्क में बीमार हुआ जाता है 
बिन सहारा दिए बाहों का तुम यूँ ही ना दवा देना

मुझे तो पसंद है दुनिया का हर हसीं रंग
बेरंग मुझको तुम यूँ ही ना फिजा देना

जीवन की इस कश्ती को किया है हवाले तेरे
छोड़ बे सहारा मुझे तुम यूँ ही ना डुबा देना

छुप छुप कर प्यार का मज़ा ही कुछ और है
दास्ताँ ए मुहब्बत को तुम यूँ ही ना फैला देना

मेरी याद अपने दिल से यूँ ही ना मिटा देना
बे वजह मुझको तुम यूँ ही ना सजा देना
वो बन कर समंदर खड़ा प्यार का 
मुझे गहरे तैरने की आदत ना थी 

उसे दिल की किताब खोल कर रख दी 
मगर मुझे पढ़ लेने की आदत ना थी 

वो अपने प्यार को नित नए पंख लगाता रहा 
मगर मुझे ऊँचे उड़ने की आदत ना थी 

आज निगाहों में सवाल ले उसने देखा मुझे 
मगर मुझे निगाहें पढने की आदत ना थी

वो बिन बुलाये ही मेरी महफ़िल में चला आता था
मुझे गैरों को जिंदगी में शुमार करने की आदत ना थी..
नहीं भागीरथ पास मेरे कैसे मिटे धरती की प्यास 
सागर से घिरा देश मेरा पर हो रही अंजुरी उदास 
यारी है कलम से तो शब्दों का जाल बुनती हूँ 
जान लो कसम से तुम्हारी गुनाहगार मैं नहीं
फासला बढ़ता रहा और भावनाएं सिमटती गयीं
मेल जोल कम होता गया और दूरियां बढती गयीं.
धोखा ना खा जाएँ कहीं इस बहुरंगी दुनिया की भीड़ से 
इसलिए हर चेहरे में छुपे चेहरे को आजमाने लगे हैं हम