जीवन में हर पल अनमोल होता है उन्ही अनमोल पलों में से
कुछ पल हमारे लिए निकालें यही गुजारिश है
Thursday, February 20, 2014
ये कलम भी कमबख्त बहुत दिलजली है जब जब भी मुझे दर्द हुआ ये खूब चली है
बहके क़दमों को जब जब साकी ने थाम लिया रंग ए वफ़ा में रंग हमने तुम्हारा नाम लिया
जूनून ए इश्क मेरा कुछ इस कदर बढ़ा खुद को खो दिया मैंने तुझे पाते - पाते ...
लबों पर हंसी दिल में गहरा दर्द छुपाये बैठे हैं वो जो छोड़ चले उनसे मिलने की आस लगाये बैठे हैं वो
कुछ मय का असर कुछ मुहब्बत का सुरूर सलीका अदब कायदों से हम तो हो गए दूर.
तेरी अठखेलियाँ जिंदगी देती हैं उसे तेरी मायूसी जीने का सबब छीन लेती है
गर मिरी अंजुरी में समंदर समाया होता दे जाती जमाने को जो कुछ पाया होता
जिंदगी है बिसात शतरंज की रोज बिछती है प्यादे चलते हैं
जीत जाते हैं खेल पैसे वाले गरीब तो सिर्फ हाथ मलते हैं
हो गया अमीरी का ये चलन यहाँ कुत्ते भी घरों में पलते हैं
अपनों के लिए वक़्त हुआ तंग दिल इनके क्लबों में बहलते हैं
भावनाओं का कोई मोल नहीं रिश्ते को कपड़ों सा बदलते हैं
रात उगा लेते हैं सूरज खुद का दिन इनकी मर्जी से ही ढलते हैं
सौगात ए मुहब्बत मिली मुस्करा रहा हूँ मैं , हाँ मुहब्बत हो गयी है तुमसे निभा रहा हूँ मैं
काश कैद कर लेती रूह को जिस्म में उम्र भर को कुदरत के करिश्में में दखल की मेरी औकात नहीं
एक चीज मांगी थी बाजार नहीं माँगा था मेरे यार यूँ तुमसा दिलदार नहीं माँगा था
जो बात मेरे जूड़े में फूल सजाने की हुई सिर्फ एक फूल माँगा बगान नहीं माँगा था
तेरी तस्वीर संग मैं अपनी तन्हाई मिटा लेता हूँ गुफ्तगू कर तेरे अक्स से मैं खुद को भुला देता हूँ.
ना सुरूर है ना फितूर है बस तुझे पाने का गुरूर है गफलतों में जीते हैं आजकल लोग कहने लगे हैं मगरूर है
ना कोई खैर ना खबर बिना इत्तला के चल देते हो किधर
यूँ आज तक गैरों को जानने में जिंदगी गुजार दी तेरे कहने से आज खुद को जानने का मन करता है
आज का न्यूटन वक़्त के साँचें में ढल रहा है भौतिकी से निकल भावनाओं में पिंघल रहा है
क्या सुरूर ए मुहब्बत है और क्या साकी है नशा चढ़ता जाता है जो शब्दों के तीर बाकी हैं
यूँ हमेशा दिल्लगी अच्छी नहीं होती यूँ हर बात हमेशा ही सच्ची नहीं होती शब्दों के तीर .. कलम से ना निकालिए कोई बिगड़ ना जाए कहीं थोड़ा संभालिये...
खुद को खोकर हम उसे आबाद कर चले अपने हाथों अपनी दुनिया बर्बाद कर चले
ना कुछ लेना ना कुछ देना मुहब्बत का रिश्ता जज्बात का है नज़रों के रास्ते दिल में समाना मामला एक मुलाक़ात का है
तूने जो पलकें झुकायीं तो रात ढल गयी तेरे जाने से महफ़िल की रंगत बदल गयी
तेरे रूठ जाने से मिरी जिंदगी ही वीरान हुई तेरी तस्वीर जो देखी तो तबियत संभल गयी
यहाँ मैं खोया खोया वहां तू भी हैं सोरूर में जान कर हाल ए दिल मेरी रुत बदल गयी
दीवाना कहता फिरता है मुझे सारा जमाना सुन तेरे होठों से खुदका नाम जाँ निकल गयी
पाया तुझे फिर से मेरी तबियत मचल गयी घटाएं उठी दिल से तो मेरी मौत टल गयी
हूक सी उठती है तो शायरी कर लेती हूँ समेट शब्दों को नज़्म ओ रुबाई गढ़ लेती हूँ
कुछ अनकहे अल्फाज मेरे तरकश में है तेरी तीर ए नज़र पर वार कर दूँ हज़ार.
कोई हया तो कोई शरारत आजमाती है हसीनो की अदाएं हर तरह से तड़पाती हैं
देख लेना मुझे खुद के दिल की किताब में शब्दों में प्रवाह सा मैं वहीँ कहीं मिल जाउंगा
है गर पाकीजा इश्क ए दस्तूर जुदाई तेरे प्यार की खातिर दर्द सह जाउंगी
गर शब्दों की मुझपे मेहरबानी हुई मैं अशरार मुकम्मल कह जाउंगी
जो हुई तल्ख़ अंदाज ए बयांबाजी सी तो मैं भी भावनाओं संग बह जाउंगी
है गर पाकीजा इश्क ए दस्तूर जुदाई तेरे वास्ते दर्द यह भी मैं सह जाउंगी
जो इशारा मिला हसरत ए पनाह को बन ख़्वाब पलकों में तेरी रह जाउंगी
ना कुरेद ये बीते लम्हे जख्म देते हैं आह तड़प रेजा रेजा मैं ढह जाउंगी
ढलने को जरूरी नहीं है पैकर का होना तेरी खुशबु मुझे भावोनाओं में बहा रही है
तिरे लम्स की मुझसे महक आ रही है संग गुजरे वक़्त का किस्सा बता रही है
मेरा हाथ उस पर खिंची कुछ आड़ी तिरछी लकीरें अक्सर मैं ढूंढती रहती हूँ इन लकीरों में कुछ ना कुछ शायद कुछ पढ़ लूँ मैं भी इनमें छुपा हुआ और सजा लूँ जिंदगी को नए रंगों से
लबों पर आकर रुक जाते हैं , आँखों से छलक जाते हैं मिरी कोशिशें नाकाम हुई , ये नज़रों से फिसल जाते हैं
तेरे दिए जख्मों की महक से जिए जा रहा हूँ मैं दर्द अपना लव्जों में बयान किये जा रहा हूँ मैं
दिल से दर्द रुखसत होने को है हमें ग़मों से फुर्सत होने को है
दुश्मनों के खेमे में दोस्ती के चर्चे कुछ जीने की मोहलत होने को है
परते उठने लगीं जो हर किरदार से रुबरू जिंदगी से हकीकत होने को है
इज़हार ए प्यार लबों की ख़ामोशी में आज नज़रों की बदौलत होने को है
हुए उनके दिल ए जागीर का हिस्सा पूरी रियासत ए हसरत होने को है
आज फिर कोई क़यामत होने को है रूह संग रूह की रिफ़ाक़त होने को है
तेरी नज़रों से पी कर नशे में चूर हूँ मैं नाम यूँ ही बदनाम हुआ शराब खाने का
किसी को फरेब देता है किसी से खा जाता है यह दिल है मेरे यारों छलता है छला जाता है
जाने क्या बात है आज शायद कुछ ख़ास है आज पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे बजने लगा जीवन का साज.
राह ए मुहब्बत में खुद ने कांटे बो दिए सदियों से सजाये रिश्ते पल में धो दिए
मुहब्बत की वुसअतें नाप सकता है कौन इन रास्तों पर खुद को कम आंकता है कौन .
छोटे से जुर्म की इतनी बड़ी सजा तो ना दो रूह को जुदा कर देह से जीने की दुआ तो ना दो
अहम् की आग ने रिश्ता बर्बाद किया दोस्त ने मुझे दोस्ती से आज़ाद किया .
मुहब्बत छूट गयी यारो फ़साने रूठ गए यारों बनाये थे जो आशियाने ख़्वाबों के वो टूट गए यारों .
आपकी दूरदर्शिता आपका व्यक्तित्व आपका कर अनुसरण हम गढ़ते अस्तित्व.
उम्मीद की किरने चमकी और आप आ गए साथ हो कर आपके हम भी मुस्करा गए महकते पलों की तमन्ना को बेताब थे हम आपकी चमक से हम भी जगमगा गए..
बिखर गए तेरी बेरुखी से रेजा रेजा कहीं मर ना जाएँ बेबसी से रेजा रेजा जिंदगी ने सोचने की मौहलत ना दी डरने लगें तेरी दिल्लगी से रेजा रेजा
खुश्क मिटटी सा हवा में उड़ा रहे हैं मुझे है दौर ए गर्दिश ठुकराके जा रहे हैं मुझे
कुछ लिखूं ऐसा के तेरा सर कलम हो जाए मेरी रोशनाई से तुझ पे एक सितम हो जाए
दिल पर चोट खाने को कर बैठी मुहब्बत नादान ना चरागरों की जरूरत ना खाली होंगे मरहमदान मिलकर ना मिले फिर भी दो आलम से गुजरे हम लिबासे-दुनयवी में रह चुप जीवन कर लिया बियावान
कभी दगा ना देना मुझे जिंदगी छूट जायेगी धड़कने साथ ना होंगी मौत भी रूठ जायेगी.
बिसात ए शतरंज की पे चाल मुहब्बत की हम थे नए खिलाड़ी जीतने का दम ना था
दर्द को जीना और आंसुओं को पीना बस यही सिखाया है मुहब्बत ने यारा
निगाह ए करम उनके हम तर हो जाते हैं जो वो शोले से भड़कते हैं हम जल जाते हैं जो हाल ए दिल सुने हमारा वो दिल लगाकर हम नादाँ हैं इतने तुरत मेहरबान हो जाते हैं