Thursday, February 20, 2014

जिंदगी है बिसात शतरंज की 
रोज बिछती है प्यादे चलते हैं 

जीत जाते हैं खेल पैसे वाले 
गरीब तो सिर्फ हाथ मलते हैं 

हो गया अमीरी का ये चलन 
यहाँ कुत्ते भी घरों में पलते हैं 

अपनों के लिए वक़्त हुआ तंग 
दिल इनके क्लबों में बहलते हैं

भावनाओं का कोई मोल नहीं
रिश्ते को कपड़ों सा बदलते हैं

रात उगा लेते हैं सूरज खुद का
दिन इनकी मर्जी से ही ढलते हैं

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