Saturday, October 27, 2012

आज मेरे दिल में नयी उमंगें जगाता है कोई 
आज मेरे मन को हौले से गुदगुदाता है कोई 
आज मेरे बंद दरवाजों पर दस्तक दे जाता है कोई 
आज मेरी तन्हाइयों में महफ़िल सजाने आ जाता है कोई 
आज मेरे जीवन में नए नए ख्वाब दिखाता है कोई 
आज मेरी बेरंग जिंदगी को नए रंगों से सजाता है कोई
आज मेरे ग़मों में आकर के मुझको हँसाता है कोई
आज मेरे तन मन को खुशबु से महकाता है कोई
आज मेरे दिल में गहरे उतर जाता है कोई
आज मेरे जीवन में नयी आशाओं का दिया जला जाता है कोई
कर उम्र भर साथ निभाने का वादा मुझ संग 
छोड़ कर साथ मेरा तुम गैर संग क्यूँ चल दिए 

जीवन को हसीं रंगों से तुझ संग सजाया था मैंने 
लेकर मेरे रंग सारे कर मुझे बेरंग क्यूँ चल दिए

तुम थे तो बहार थी मेरे जीवन में हर ओर
एक आंधी सी ,उड़ा कर पतझड़ तुम क्यूँ चल दिए

तुम थे तो ठहाकों से गूंजती थी मेरी दुनियाँ
कर मेरे जीवन में खामोशियाँ तुम क्यूँ चल दिए 

मुझे अंधेरों से डर नहीं लगता 
बस कुछ नकाब पहने चेहरों से डर जाती हूँ 
दोस्त के भेष में छुपे कुछ लोग 
क्या मुमकिन कब नकाब उतार फेंके 
बस यही सोच कर घबराती हूँ ...........................अंजना चौहान

आज एक मुलाकात होते होते रह गयी
आज आमने सामने बात होते होते रह गयी 
वो नज़रों के सामने से मेरी निकल गया 
आज मेरे हाथ से मेरा वक्त फिसल गया 
काश !! वो चन्द घड़ियाँ फिर से लौट आयें 
काश !! वो बीते पल मेरी बाहों में सिमट आयें .............अंजना
वो भी क्या दिन था जब वो मुझसे पहली बार मिला था 
वो दिन जब दिल की धडकनों का अहसास हुआ था 

मेरी नज़रों से जब उनकी नज़रें टकरायीं थी 
एक सिहरन सी मेरे अंग अंग में दौड़ आई थी 

पहले मिलन का हर अहसास नयी उमंग जगाता है आज भी
पहले मिलन का हर अहसास मुझे बीते पलों में पहुंचता है आज भी 
रेत का घरोंदा बनते ही मिट जाता है 
पानी के आगे वह टिक नहीं पता है

आज हमने भी एक घरोंदा बनाने की ठानी है 
बनाना मेरा कौशल तो मिटाना पानी की कहानी है 
छोडकर जो चल दिए तुम साथ मेरा 
बिन तुम्हारे अब ना मैं जी पाउँगा 
जब साँसें ही मुझसे रुंठ जाएँगी मेरी 
मैं तो सनम फिर बेमौत ही मर जाऊंगा

सच्चे प्यार में भी धोखा हो जाता है कभी कभी
जिसके लिए छोड़ा सबको वही छोड़ कर हमको चला जाता है कभी कभी

जिसको किया था प्यार टूट कर हमने कभी
वही दिल तोड़ कर हमारा चला जाता है कभी कभी

जिसके लिए हम जीने का सहारा हुआ करते थे कभी
वही बेसहारा छोड़ कर हमको चला जाता है कभी कभी

मजबूरी समझ जिसकी गलती को हम कर दिया करते थे नजर अंदाज
वही जालिम गुनाह पर गुनाह करता चला जाता है जाता है कभी कभी

जिसके संग हसीं ख्वाब सजाये थे कभी हमने साथ मिल
वही ख्वाब सारे तोड़ कर चला जाता है कभी कभी

जिसकी आबोहवा में गूंजती थीं कभी किलकारियां हमारी
वही हमको रोता छोड़ कर चला जाता है कभी कभी 
तेरी ये मुस्कान है ,अलादीन का जादुई चिराग हो जैसे 
तेरे मुस्कराने भर से मै तो जन्मों की ख़ुशी पा लेती हूँ
तेरी ये मुस्कान है ,अलादीन का जादुई चिराग हो जैसे 
तेरे मुस्कराने भर से मै तो जन्मों की ख़ुशी पा लेती हूँ
तेरी ये मुस्कान है ,अलादीन का जादुई चिराग हो जैसे 
तेरे मुस्कराने भर से मै तो जन्मों की ख़ुशी पा लेती हूँ
तेरी ये मुस्कान है ,अलादीन का जादुई चिराग हो जैसे 
तेरे मुस्कराने भर से मै तो जन्मों की ख़ुशी पा लेती हूँ
किसी के दिल की हम धड़कन हुआ करते थे कभी 
आज उसी धड़कन के लिए दिल का सहारा ढूंढते हैं 

किसी के लिए जीने का सबब हुआ करते थे हम कभी 
आज खुद हम अपने जीने को बस एक सहारा ढूंढते हैं
मेरी वफाओं के बदले में वो बेवफाई कर के चला
चाहत को मेरी आज मेरा महबूब मुकर के चला

खुदा ने कुछ सोच कर ही नैन नक्ष्स तराशे होंगे हसीनाओं के 
नहीं तो लिखने वाले हुस्न पर अपनी तहरीर भला कैसे लिखते

मेरी मुस्कराहट की भी जसूसियाँ होने लगी हैं 
मेरा कहकहे लगाने को जी चाहता है

मेरी मुस्कराहट की भी जसूसियाँ होने लगी हैं 
मेरा कहकहे लगाने को जी चाहता है
जीवन की इन राहों पर आसा नहीं है चलना 
हम भी चल लेते दो कदम गर तेरा साथ होता
तेरे साथ बीते पलों के हर अहसास से गुजरती हूँ 
बिन तेरे न तो जी पाती हूँ और न मैं मरती हूँ 
जहां तुम चले गए काश साथ मुझको भी ले जा पाते 
विधाता ने जो यह खेल रचाया काश उसको हम झुठला पाते
तेरी ही याद में रहकर मैं हर पल जी कर भी मरती हूँ 
संग जा पाती मैं भी तेरे विधाता कुछ रचता ऐसा विधान
कर जोड़ विनती मेरी तुझसे प्रभु यही प्रार्थना करती हूँ
पहुंचा दे मुझको भी पास प्रियतम के न जी पाती हूँ न मैं मरती हूँ
तुमने बढाई है रौनकें इस बेजान महफ़िल की 
तेरे उठकर चले जाने से बड़ी तकलीफ होती है
ये फ़साना नहीं हकीकत है जिंदगी की 
हमें वीरानो के आने से बड़ी तकलीफ होती है 
तेरी आशिकी से पहले गुमनाम थे हम 
अब नाम हो जाने से बड़ी तकलीफ होती है
तेरे नाम के साथ जोड़ लेता है हमें सारा जमाना
बदनाम हो जाने के डर से बड़ी तकलीफ होती 

आज सोचा खुद की खुद से बात हो जाए 
एक हलकी सी खुद से मुलाकात हो जाए 
हर वक़्त ख्याल रहता है मुझे अपनों का 
तो खुद में ही मेरे अपनों को पा लेती हूँ मैं

ए राहगीर रास्ते से गुजर पूरे रास्ते पर अपना अधिकार ना समझ
रास्ते किसी के नहीं होते , रास्ते सिर्फ मंजिल का पता देते हैं
स्वार्थ इंसान को अँधा बना देता है सुना था
तुम भी इतने स्वार्थी निकलोगे सोचा ना था
हँसते खेलते संग में बीत जाता था समय हमारा
तुम हमारी हंसी पर ही पाबन्दी लगाओगे सोचा न था
नादान थे हम जो दोस्त समझ नादानियां करते गए
तुम हमारी नादानी को यूँ दिल से लगाओगे सोचा ना था

सिर्फ औरों से नहीं आज खुद से भी दूर हैं हम 
ए जिंदगी आज कुछ ज्यादा ही मजबूर हैं हम 

सितम सहने की आदत है हमें ज़माने भर के 
पर उसके हर सितम से दूर बहुत दूर है हम 

अब नज़र फेर कर भी देखता नहीं वो हमारी ओर
कभी कहता था इस दुनिया में असल कोहिनूर हैं हम

आज मेरी मांग को वो सूना करके चला गया
कभी कहता था तेरी मांग का सुर्ख सिन्दूर हैं हम

ए जिंदगी आज कुछ ज्यादा ही मजबूर हैं हम
ए जिंदगी आज कुछ ज्यादा ही मजबूर हैं हम
हम तो गफलतों में जिए जहां अपना पता भी कोसों दूर 
तेरा पता हमें याद याद रहता यह ग़लतफ़हमी ना पाल
सादगी भी पेचीदा होकर आती है हमारे किरदार में 
हमने तो हर शय को मात दी है तो भला सादगी ही कैसे बच पाती
हमने अपनी संवेदनाओं को कागज़ की चिंदियों पर उकेरा कुछ इस तरह 
लम्हा लम्हा जिया जाता है जिंदगी को विभिन्न किरदारों में जिस तरह 

ये कागज़ की तमाम चिन्दियाँ ही दस्तावेज हैं मेरे जीवन मूल्यों के 
सहेज लो !! आने वाली पीढ़ियों को बेबाक जीने की कला मिल जाएगी
कसौटी पर आज हमको कसने लगा है जमाना 
सोचते हैं अब अपना अंदाज ही बदल लिया जाए
जिंदगी मुक्त उड़ान सी, जीना सीख लो यारो 
गुस्सा शत्रु है इंसान का ,पीना सीख लो यारो
हमने ख्वाबों को आखों में पाला यारों 
हमने अपनों को दिल में संभाला यारों 
उड़ नहीं पाते क्योंकि पर नहीं हमारे 
हमने तो ख्वाबों में ही खुद को उड़ा डाला यारों
हमने अरमानो को आंसुओं में बहाया ना था 
शायद उसे दिल की गहराइयों में बसाया ना था 
यूँ तो सौदा बहुत किया उसने मेरी वफाओं का 
पर कभी खुद वफ़ा को उसने निभाया ना था

Thursday, October 25, 2012

न आँखों से न लव्जों से न हालातों से बयां करते हैं 
ये तो जज्बात है जो हमारे बीच की मुहब्बत का हाले दिल बयां करते हैं
..
हम तुम बरसों बाद मिले हैं 
इन नैनों को कुछ कह लेने दो 
जब तक ये तौल रहे जज्बातों को 
तुम हमको मौन ही रहने दो 
मत रोको इस अश्रु धारा को 
बहती है जितना बहने दो
मेरे आंसुओं का हिसाब आज उसके पास नहीं 
अपनी करनी की किताब आज उसके पास नहीं 
हम तो जी सकते थे तनहा भी उसकी यादों के सहारे 
पर अब हमारे दिल में उसकी कोई मीठी याद नहीं
ताज - ए - मुहब्बत इतनी आसानी से मिल जाए यह सोचना भी मत 
अच्छे अच्छे खिलाड़ी भी अपने हौसले पस्त कर देते हैं इसे पाने में
यूँ ही कोई किसी से दिल लगाया नहीं करता 
यूँ ही कोई किसी के करीब आया नहीं करता 
अनजान बन महबूबा की हर तकलीफ से 
कोई यूँ ही दूरी बढाया नहीं करता 
समय के पहिये ने भी शायद आज करवट बदली है 
नहीं तो कोई कोई यूँ अपनी महबूबा से रुंठ जाया नहीं करता
हर वक़्त मेरा ही खालाल ये अच्छी बात नहीं 
मेरी हर हरकत का हिसाब ये अच्छी बात नहीं
चल रे मन उड़ जा कहीं बादलो के पार 
जहां कोई ना हो मेरे अहसासों के सिवा
रात के अंधियारे और दिन के उजाले का फर्क महसूस नहीं होता
शायद मुहब्बत की खुमारी का असर होने लगा है अब
 

Tuesday, October 23, 2012

दर्द ए दिल मेरा आज आम हो गया 
आज भरी महफ़िल मेन मेरा नाम हो गया
तेरे साथ बीते पलों की सौगात हैं आंसू 
बिन मौसम में लगी झड़ी सी बरसात हैं आंसू
मेरे हर अंदाज से वाकिफ है जमाना 
बस एक तुम्ही हो जिसे मेरी पहचान ना हुई
अपनी नज़र में तो हर कोई नायब होता है 
दूसरे कि नज़र से देखो तो कोई बात बने
साथ - साथ

दिल्लगी अब दिल की लगी हुई जाती है समझ
जिंदगी और मौत सब एक हुई जाती है समझ.
 
बदलेगा कितना आखिर फिर भी बदल ना पायेगा
चाहे छिपा ले खुद को जितना फिर भी पकड़ा जाएगा
 
जनाब बचपना हम नहीं आप दिखाते हैं 
कभी हामी भरते हैं और कभी मुकर जाते हैं
जहां गूंजती थी महफ़िल यारों से वहां आज सन्नाटा है 
बेरहम वक़्त का मेरे मुंह पर यह कैसा तमाचा है 

रोता हुआ सा बच्चा बन मैं अपने गाल सहलाती हूँ 
बीते वक़्त की यादों को मैं स्वेटर सा बुनती जाती हूँ
हमने नज़रें क्या चुराएँ तुम तो नज़रबंद हो गए 
किसी के दिल में यूँ छुप जाना कोई आपसे सीखे 

मुहब्बत निभानी ना आई हमें दुश्मनी बढ़ाते गए 
अपने दुश्मन को भी गले लगाना कोई आपसे सीखे 

किसी के जज्बातों की कब परवाह थी हमें 
पलकों में नए ख़्वाब सजाना कोई आपसे सीखे
तुम हर बात के लिए मुझको ही गुनाहगार ठहराते हो क्यूँ 
और मैं आज तक अपने किये उस हर गुनाह से अनजान हूँ
क्यों ना हम किसी के लिए मिसाल बन जाएँ 
अपनी जीते जी कोई ऐसा काम कर जाएँ
सफ़र का क्या ये तो कट ही जायेगा 
मंजिल पूरी होगी तभी जब कोई हमसफ़र मिल जायेगा
जीवन कि चढ़ती उतरती धूप में कुछ अपनों का सहारा होता 
डगमगाते हुए कुछ अहसासों को मेरे अपनों ने उबारा होता 
यूँ तो तनहा ही डूब जाते हैं लोग बीच मझधार में 
हर किसी की किस्मत में नहीं किनारा होता

Monday, October 22, 2012

हैरान हूँ मैं देख कर ये कौन आ गया 
तेरे मेरे दरमियाँ जो फासला बढ़ा गया

मुहब्बतऔर दीवानगी का फर्क हम जानते ना थे 
वो जाते जाते हमें मुहब्बत का नया पाठ पढ़ा गया

मुश्किलें मेरी ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेतीं 
ये कौन है जो मुझ पर और मुसीबतें चढ़ा गया
"बाला" को अबला समझने वालों 
कहीं ऐसा ना हो ये अबला किसी दिन "बला" बन बैठे
अहसास ज्वार भाटा से चढ़ते उतरते हैं मेरे 
आने वाले तूफ़ान का अहसास हो रहा है मुझे
तेज चटक धूप में मैं बर्फ सी पिघलती हूँ 
ठहरी हुई सर्दी में मैं परत - परत जमती हूँ 

कुछ अधूरे ख्वाबों को मैं अब भूल चली हूँ 
रंग-ए-तन्हाई में मेरी मैं रोज ही मरती हूँ
मेरी कलम का वास्ता मेरे अहसासों से है 
मैं अपने अहसासों को पन्नो पर सजा देती हूँ
बरसात बरसती है अहसासों को पनपाने को
भूले बिसरे कुछ रिश्ते याद आने को
 —
जिंदगी किसी पैमाने कि मोहताज़ नहीं होती 
सुरूर -ए-इश्क जब सर चढ़ कर बोलता है
क्यों ना आज अपनी गजलों को नया नाम दे दूँ 
तेरी मेरी मुहब्बत को एक नया मुकाम दे दूँ
यादें बीते पलों की मुझको बहुत आती है 
तन्हाई में ये अक्सर मुझको बड़ा रुलाती हैं
आज वो मुझे कुछ हसीं जज़्बात दे गया 
आज वो मुझे कुछ नए अहसास दे गया 
तन्हाइयों में अब तक गुजरती थी जिंदगी मेरी 
आज मेरी तन्हाइयों को वो अपनी यादों की सौगात दे गया
यूँ तो अक्सर ही मेरा दिल ग़ज़ल गुनगुनाता है 
मेरे अहसास बयाँ हो जाते हैं और मन महक जाता है
सतरंगी ख्वाबों का तेरे जब ख्याल आता है मुझे 
मैं भी तेरे संग तेरे अहसासों से बंध जाती हूँ
हिचक और हिचकी का ताल्लुक सिर्फ इतना था ....
इसे हिचक थी अपना प्यार जताने में 
उसे हिचकी आती थी इसकी यादों में आने में 
अपनों संग बगावत की हिम्मत ना जुटा पाए 
अपने अहसासों को हम छलते रहे उम्र भर
अकेलापन मेरा अब काटे नहीं कटता 
भीड़ भरे माहौल में ही रहा जाए तो अच्छा
इस शहर में भीड़ बढती ही जा रही है गगनचुम्बी इमारतों की 
सूरज की नहीं यहां ट्यूबलाइट की रौशनी में देखने के आदि हैं लोग
कहते हैं इश्क की कोई जुबाँ नहीं होती 
ख़ामोशी अपना हाले दिल अपनी नज़रों से बयाँ करती है
आज मेरी धडकनों का मुझे कुछ मुगालता हुआ 
सवाल इनसे मैंने पुछा कुछ सालता हुआ 
सांस मैं लेती हूँ जब तो गैरों के लिए धड़कती हो क्यूँ 
कर मुझसे बेवफाई और के लिए वफ़ा निभाती हो क्यूँ
मेरे आंसुओं का हिसाब आज उसके पास नहीं 
अपनी करनी की किताब आज उसके पास नहीं 
हम तो जी सकते थे तनहा भी उसकी यादों के सहारे 
पर अब हमारे दिल में उसकी कोई मीठी याद नहीं
जिंदगी किसी पैमाने की मोहताज़ नहीं होती 
सुरूर -ए-इश्क जब सर चढ़ कर बोलता है.
खाकर अहं पर चोट तो कालिदास भी महाकवि बन जाते है 
चोट लगती है दिल पर तो टूटे दिल तराना-ए-ग़ज़ल गुनगुनाते हैं
पल - पल बदलते हैं आजकल अहसास मेरे ...रुत भी है मौसम बदलने की 
कभी दिल दिमाग पर तो कभी दिमाग दिल पर हावी हो जाता है ना जाने क्यूँ