तेज चटक धूप में मैं बर्फ सी पिघलती हूँ
ठहरी हुई सर्दी में मैं परत - परत जमती हूँ
कुछ अधूरे ख्वाबों को मैं अब भूल चली हूँ
रंग-ए-तन्हाई में मेरी मैं रोज ही मरती हूँ
ठहरी हुई सर्दी में मैं परत - परत जमती हूँ
कुछ अधूरे ख्वाबों को मैं अब भूल चली हूँ
रंग-ए-तन्हाई में मेरी मैं रोज ही मरती हूँ
No comments:
Post a Comment