Monday, August 5, 2013

पलकों की कोरों पर अक्सर कुछ ख़्वाब पनप जाते हैं 
तकिये की नमीं में जागती रातों का किस्सा बयाँ कर जाते हैं 
जो रगों में बहता हो लहू बन दिल में धड़कता हो धडकनों सा 
बिन कहे भी उसके जज्बात सीधे दिल में उतर ही जाते हैं..

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