Monday, August 5, 2013

यादों की चांदनी उसके आँगन में छिटक आई होगी 
एक मासूम कली फिर फूलों सी खिल आई होगी 

लट गेसुओं की उसके गालों पर बिखर आई होगी 
याद कर बीते लम्हें वो खुद में ही शरमाई होगी 

खेली होगी अरमानों संग आँख मिचौली उसने 
जवाँ उमंगें सहर की धूप सी अलसाई होगी 

सरक आँचल उसके काँधे पर ढलक आया होगा 
बेखुदी पर अपनी वो मन ही मन मुस्काई होगी

खुद को उसने जब आईने में संवारा होगा
नज़र उसकी खुद की सूरत पे ठहर आई होगी

अक्स मेरा ही उसे खुद में नज़र आया होगा
एक पल को बिजली सी बदन में लहराई होगी

सुरूर ए इश्क पर वो खुद में ही इठलाई होगी
तड़प मिलने की फिर एक बार उठ आई होगी 

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