Thursday, November 29, 2012

गरीब हो या अमीर बच्चा होता है नंगे बदन पैदा 
क्यूँ सूरत ए जच्चा खाने में कोई फर्क नहीं होता 

सर्द रातों की ठिठुरन में गुज़र जायेंगे कुछ लोग 
क्यूँ आसमान को झुग्गियों पर रहम नहीं होता 

संसद में बैठ जुगाली की बात ही फिजूल है 
क्यूँ नेता कभी सरहद पर प्राण नहीं खोता 

गरीब की थाली भी चंद टुकड़ों की मोहताज 

क्यूँ अमीर का कुत्ता भी भूखे पेट नहीं सोता


अमीर को गम हो आंसुओं की बरसात नहीं होती

क्यूँ गरीब कभी भी इतनी तहजीब से नहीं रोता


महलों में रह नर्म बिस्तरों पर भी नींद नहीं आती

क्यूँ गरीब फर्श पर भी लम्बी चादर तान कर सोता

Wednesday, November 28, 2012

मधुर ध्वनि बन प्रपात की मीठा संगीत सुनाऊं 
आबो हवा में मीठा मधुर सा राग छेडती जाऊं
मधुर ध्वनि बन प्रपात की मीठा संगीत सुनाऊं 
आबो हवा में मीठा मधुर सा राग छेडती जाऊं
मेरे पैरों में चक्कर है मैं रोज ही घूमने जाती हूँ 
मिलती हूँ कभी अपनों से कभी गैरो को दोस्त बनती हूँ 
हालात के मारों की हालत , टूटने वालों पर जरा गौर करो 
उनके शब्द दर्द में डूबी हुई नज्में ,बस उन्हें कलम बद्ध करो
किसी पर तोहमत क्या लगाऊं मैं जब जख्म अपनों ने दे डाले 
मेरी चाहतों के बदले वो चल दिए कर मुझको वक़्त के हवाले
आज एक शेर पढ़ा और उसको अपनी कलम से आगे बढ़ाया .....
.
कर्ज हमारे सभी उतर जाएँ 
जिंदगी चैन से गुज़र जाए 

अहसान ना रहे किसी का हम पर 
चुन चुन कर हिसाब कर जाएँ 

पहचान बन जाए ज़माने के लिए 
इससे पहले की हम मर जाएँ 


जुबाँ पर नाम हो सदियों तक

ऐसा मुकम्मल काम कर जाएँ
किसी के आने की आहट भर से खिली उठी है मेरी फिजायें 
मचल उठा है मन देखने को उसकी वही कातिल सी अदाएं 

Tuesday, November 27, 2012

कुछ रिश्तों का कभी कोई नाम नहीं होता

कुछ रिश्तों का कभी कोई अंजाम नहीं होता

दिल तड़पता है बेगाने को भी पाने को

मुहब्बत का कभी कोई ईमान नहीं होता 

मेरी हर तहरीर में तेरा जिक्र
आने वाले कल की आहट तो नहीं 

Sunday, November 25, 2012

चाहत के बिना तेरे दिल में समा जाते कैसे !!
बिना इजाज़त अहसासों में उतर जाते कैसे !!! १ !!!


कर ही दिया ये तनहा दिल जब हवाले तेरे !!

खुद की धडकनों को फिर हम अपनाते कैसे !!! २ !!!


हम फ़साना कहते रहे और तुम खामोश रहे !!

बिना दस्तक बंद खिड़की को खुलवाते कैसे !!!३ !!!


हमने अश्कों में बहा डाले हसीं जज़्बात सारे !!

तड़प तीर सी चुभती है तुझे समझाते कैसे !!! ४ !!!


सूरूर ए इश्क में मिटा दिया खुद वजूद मैंने !!

लिखा न हो जो किस्मत में तो लिखवाते कैसे !!! ५ !!!



टूटने पर दिल के लिख डाली इक ग़ज़ल हमने !!

सुनता नहीं था शेर कभी उसे ग़ज़ल सुनते कैसे !!! ६ !!!



जब कलम चली ही नहीं तुम्हारी हमारे वास्ते !!

तेरे शब्दों में तेरे गीतों में खुद को ढलवाते कैसे !!! ७ !!!



तेरे देखे बिना तेरी नज़रों में नज़र आते कैसे !!

तेरे इशारे बिना तेरी रूह से मिल पाते कैसे !!! ८ !!!.....अंजना 

Saturday, November 24, 2012

आज फिर तेरी याद मेरी तन्हाई पर हावी है !
बीते लम्हों को अपने शब्दों में पिरोया मैंने !!

जी लेते हैं लोग आँधियों में उजड़ जाने के बाद !


जीने के लिए तेरी यादों से खुद को भिगोया मैंने!!

कर उम्र भर साथ निभाने का वादा मुझ संग

छोड़ कर साथ मेरा तुम गैर संग क्यूँ चल दिए


जीवन को हसीं रंगों से सजाया था तुझ संग मैंने

लेकर मेरे रंग सारे कर मुझे बेरंग क्यूँ चल दिए


तुम थे तो बहार थी मेरे जीवन में हर ओर

एक आंधी सी उड़ा कर पतझड़ तुम क्यूँ चल दिए


तुम थे तो ठहाकों से गूंजती थी मेरी दुनियाँ

कर मेरे जीवन में खामोशियाँ तुम क्यूँ चल दिए 
मेरे हाले दिल का बस इतना सा फ़साना है 
जो चाहे टूट कर मुझे उस का दिल तोड़ कर जाना है 
वो मुझे मिला ये अच्छा नसीब था मेरा 
उसे अपना बनाना जुनून बन गया मेरा
रूह के रिश्तों को किसी कसौटी पर ना कस

कुछ रिश्ते अहसासों से गुजर जाया करते हैं
तुम्हारी खामोशियों ने नज़रें पढना सिखाया हमको 

जो तुमने न कहा तुम्हारी नज़रों ने बताया हमको

ए दोस्त तू यूँ ही मुझे बेवजह बदनाम ना कर 
जो अच्छा ना लगे मुझे ,ऐसा कोई काम ना कर 
आज तुम्हारी सोच को अपने शब्दों का संसार दे दूँ 
आज तेरे अहसासों को अपनी कलम से आकार दे दूँ
तेरे साथ बीते पलों की महक से मुस्कराने लगे है हम

प्यार में खोकर अक्सर कुछ भी गुनगुनाने लगे हैं हम 
वो खिलाड़ी था मंझा हुआ हमें मालूम ना था

आज उसके एक और अंदाज से हम रूबरू हुए 
आज फिर तेरी याद मेरी तन्हाई पर हावी है !

बीते लम्हों को अपने शब्दों में पिरोया मैंने !!


जी लेते हैं लोग आँधियों में उजड़ जाने के बाद !

तेरी यादों के सहारे होकर जीना सीख लिया मैंने !!.
हमारे हर हसीन जज़्बात का तमाशा बना देते हैं लोग

बेवफा होकर हमसे वफ़ा की उम्मीद लगा लेते हैं लोग.
जिंदगी हर मोड़ पर नयी सीख देती नज़र आती है मुझे !

मैंने किसी फलसफे को कभी को नज़र अंदाज ना किया !!..
एक तरफा कोई रिश्ता नहीं होता है कभी भी

हम तो रूठ कर परखते है रिश्ते की गहराई को.....
अपनापन न समझना बड़ा धोखा है इस फरेबी दुनिया में

जो दिखाई दे खुली नज़रों से उस पर कभी ऐतबार ना कर
वजह सुईं की नोक सी भी हम ढूढ़ लेते हैं रूठने के लिए

इतना भरोसा है हमें उन पर जो हम रूठे तो वो मना लेंगे
यहाँ बंदिशे नहीं होती सिर्फ महरबानियाँ हैं

सारी हदे टूट जाती हैं यहाँ प्यार की खातिर
रूह को रूह से जुड़ जाने दो

एक बार खुद से गुज़र जाने दो

Thursday, November 22, 2012

तुम अपने हुनर में माहिर हम अपने फन में जबरदस्त 
तुम कमाने में व्यस्त और .........हम खरचने में मस्त 
मुझको अब ये आंधियां सताने लगीं हैं 
मैंने खुली खिड़की में दिया जलाकर रख दिया 

हाथों की ओट कर खिड़की पर बैठने लगीं हूँ हर पल 
इन तेज हवाओं ने मेरे हौसले को हिलाकर रख दिया 

मुमकिन नहीं ये आंधियां बुझा पायें मेरी आशाओं का दिया 
इस कहर ने मेरे अपनों को मेरे नज़दीक ला कर रख दिया .
चौंक जाती हूँ मैं अक्सर सुन जिक्र तेरी बात का 
तेरे हर किस्से में जिक्र होता है हमारी ख्वाबों की मुलाक़ात का
उपहार नहीं उधार दीजिये 
मिले को वापसी का सरोकार दीजिये ........
मेरा दिल बेवफा अब मुझसे ही होने लगा है 
प्यार की इन गुमनाम गलियों में खोने लगा है
सुनहरे ख़्वाब दिखकर .....छलते हैं चाहने वाले 
होश-ओ- हवास में आये तो हर झूंठ से पर्दा हटा
ले सर कलम कर दे ओ हुस्न की मलिका 

मेरा गुनाह सिर्फ यही कि तेरा दीदार किया 
मेहनत पर किसी की वाहवाही बटोरना 
होता नहीं हज़म कुछ सबक सिखाइए 

चुरा कर लिखने वालों के लिए बज रही हैं तालियाँ 
मेरे हमकलम आइये इन्हें बजाने का बीड़ा उठाइये 

सजा कुछ ऐसी मुक़र्रर करें इन चोरों के लिए 
आगे से दोहरायें ना यह ऐसा पाठ रटाईये ..
परदेसी से दिल लगाया बहुत भूल हो गयी 
फितरत से बाज अजनबी आते ही कब हैं 

फूट फूट कर रोने से अब होगा कुछ नहीं हासिल 
ठोकर जब खा जाते हैं अक्ल आती ही तब है .
रूठना मनाना होना होना था बहुत हुआ !
सब्र टूटने लगा है मेरा अब मान भी जाइए !!

कहने और सुनने की यहाँ बात है फिजूल !
हम ही रूठ जाते है अब आप हमें मनाइए !! 

गुजर जायेगी जिंदगी तमाम साथ में तेरे !
विश्वास डिग रहा है मेरा भरोसा दिलाइये !!

चलो देर से ही सही मुस्करा तो दिए ! 
रूठोगे अब कभी नहीं यह कसम खाइए !! ...
हम तो कल भी तुम्हारे करीब थे और न कभी होंगे तुमसे जुदा
जो लिखा हो नसीब में .................उसे मिला ही देता है खुदा 
रंज किसी बात का करने से वो बदल जाती नहीं 
हौसला जिंदगी में हर दम आगे बढ़ने कि प्रेरणा देता
तोहफा ख़ुशी का कबूल किया तो गम का भी कर लो 
अहसास अपने जिन्दा रखो और उन्हें ग़ज़ल कर लो.
इस दुनिया में रंगरेज बहुत देखे हमने 
हर चेहरे में छुपे चेहरे कि पहचान होने लगी है अब 
हम अपनी खुद्दारी पर जीने की जिद में अड़े रहे 
ज़माने की रफ़्तार का अंदाजा हमें हरगिज ना था.
मुश्किल है जिंदगी हर रोज ही एक नए इम्तहान सी !
मैं इम्तहान कैसे करूँ अपने हुनर की पहचान कैसे करूँ !!
मेरी सोच की आवारगी कम ना थी 
वहीँ पहुँच जाती है जहाँ मेरा कोई सरोकार नहीं 
ग़मों से अब मेरा वास्ता ही नहीं रहा ...
मैंने परेशानी में भी मुस्कराना सीख लिया है ..
उम्र भर साथ निभाने का वादा भला कौन करता है आजकल 
दो घडी साथ बैठ कोई मुस्करा दे तो बहुत है इस ज़माने में 
किसी के जुल्म को चुपचाप सहना भी एक जुल्म है खुद पर 
ना सहो जुल्मों सितम अपनी आवाज बुलंदी तक पहुँचाओ यारों 
अपनी सोच पर अंकुश भला कैसे लगा दूँ मैं 
मेरी सोच ही तो आइना हैं मेरे व्यक्तित्व की 

मैं शब्दों में अपने विचारों को ढाल देती हूँ 
मेरी कलम ही तो पहचान है मेरे अस्तित्व की
हम समझते रहे हम अक्लमंद हैं बहुत पर ...
मौकापरस्त इस दुनिया के आगे हम मंदअक्ल ही निकले 
कोई भी बात बेवजह नहीं होती है कभी 
हर बात की गहराई को समझना जरूरी है 

संतुष्टि पाने के लिए इस बदलते दौर में 
खुद के बनाए उसूलों पर ही चलना जरूरी है 
तुम हमसफ़र हो मेरे मेरी सुनो और अपनी कहो 
सुनते सुनाते एक दूजे के अहसासों को बाँटना अच्छा .
यूँ तो पत्थर पर पानी की बूँद रोज गिरती रहे तो अपने निशाँ छोड़ देती है 
मैंने अपने दुश्मन से दिल लगा उसकी नफरत को मुहब्बत में बदलते देखा 
दिल लगाने के लिए अब किसी की आरजू न कर 
जितनी दिल्लगी करनी थी कर ली अब और दिल्लगी न कर...
बहुत देखे हमने तमाशा बनाने वाले 
बहुत देखे हमने सबको हँसाने वाले 
देखना बाकी था कुछ अब वो भी देख लिया हमने 
हाँ और ना के बीच की किसी कशमकश में फस जाने वाले.....
परम्पराओं का दायरा भी कभी कभी टूटने लगता है 
जब कोई टूट कर चाहे तुम्हें और तुम्हें उसकी पहचान हो जाए.
किस्मत से लड़ना बड़ी बात है 
बार बार गिर कर संभालना बड़ी बात है 
यही खुद की खुद से असल मुलाकात है
..
अंदाज़-ए-गुफ्तगू बदल भी जाए तो क्या 
अन्दर की बात धीरे धीरे जान ही लेते है लोग
चंद पलों में हज़ार पल जी लिए हमने 
तेरा हवा के झोके सा आना एक नया अहसास दे गया
जीत और हार के मायने बदल जाते हैं जब 
खुद का अपनी धडकनों पर भी काबू न रहे...
सूरज की तपिश लेकर न जलना मेरे दोस्त
मेरी दोस्ती की छाव में चंदा सी शीतलता है छिपी ........
नुमाइश अपनी पाक मुहाब्बत की ठीक नहीं है 
प्यार का असल मोल वह पहचान ही लेता है जिसने सच्ची मुहब्बत की हो
आओ उदासियों को एक हसीं शाम दे दें 
अपने रिश्ते को एक नया आयाम दे दें 
धार आ गयी कलम में महरबानियाँ तेरी 
मुहब्बत के नगमों की ये कहानियां तेरी...
काश अमर बेल मेरे पास होती तो रिश्तों को आसमा तक पहुंचाती मैं 
लेकिन गम नहीं .......मेरी सोच में मेरे रिश्ते हर उंचाई को छू लेते हैं ..
आज किसी के प्यार की गहराई को देखकर 
राहें वफ़ा की चलने को मजबूर हुए जाते हैं हम 

किसी के सच्चे प्यार को ठुकराना है अब मुश्किल 
आज खुद के बनाये उसूलों से दूर हुए जाते हैं हम ....अंजना चौहान
जुल्फों के पेंच में न जाने क्यूँ उलझ बैठा वो दिल का मारा 
न तो मरने की ही हालत है और न ही जीने का दम बाकी..
वो तो छलिया था 
नाजुक दिलों को छलना उसकी फितरत में था 
वो हमें हसीं ख्वाब दिखा कर छलता रहा 
हम नासमझ थे प्यार जो कर बैठे थे 
उसके दिखाए ख़्वाब को हकीकत समझते रहे ........
कर उम्र भर साथ निभाने का वादा मुझ संग 
छोड़ कर साथ मेरा तुम गैर संग क्यूँ चल दिए 


जीवन को हसीं रंगों से तुझ संग सजाया था मैंने 
लेकर मेरे रंग सारे कर मुझे बेरंग कर क्यूँ चल दिए

तुम थे तो बहार थी मेरे जीवन में हर ओर
एक आंधी सी उड़ा कर पतझड़ तुम क्यूँ चल दिए

तुम थे तो ठहाकों से गूंजती थी मेरी दुनियाँ
कर मेरे जीवन में खामोशियाँ तुम क्यूँ चल दिए 
मेरे हाले दिल का बस इतना सा फ़साना है 
जो चाहे टूट कर मुझे उसी का दिल तोड़ कर जाना है .
मेरी खता बस इतनी सी थी के नज़रें उठा कर देखा उसे 
वो नज़रों के रास्ते दिल में उतर जाएगा सोचा ना था

वक़्त की चाल आखिर देखूं तो कैसे देखूं
मेरी नज़रों ने भी मुझसे बेवफाई कर ली
जिसका जिक्र हमारे हाथों की लकीरों में न था 
आज उसी को हमने अपनी तकदीर बना डाला 

जिससे दूर दूर तक हमारा वास्ता भी ना था कभी 
आज उसी के संग हमने जन्मों का वादा कर डाला 
वो मुझे मिला ये अच्छा नसीब था मेरा 
उसे अपना बनाना जुनून बन गया मेरा....अंजना
रूह के रिश्तों को किसी कसौटी पर ना कस 
कुछ रिश्ते अहसासों से गुजर जाया करते हैं .
तुम्हारी खामोशियों ने नज़रें पढना सिखाया हमको 
जो तुमने न कहा तुम्हारी नज़रों ने बताया हमको ...
ए दोस्त तू यूँ ही मुझे बेवजह बदनाम ना कर 
जो अच्छा ना लगे मुझे ,ऐसा कोई काम ना कर ....
शतरंज की बिसात सी पेचीदा है यह जिंदगी 
जिसने मोहरे सही जगह बैठाए बाजी उसी के हाथ आई .
आज तुम्हारी सोच को अपने शब्दों का संसार दे दूँ 
आज तेरे अहसासों को अपनी कलम से आकार दे दूँ.......अंजना 

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Tuesday, November 6, 2012


ऐसा नहीं कि मेरी जिंदगी से मुझे प्यार नहीं
पर मेरे लिखे का असल से कोई सरोकार नहीं |
मेरा दर्द-ए-दिल मेरे शेरों में खूब नज़र आता है
तहरीरों में दर्ज मेरे अहसास हैं कोई अखबार नहीं |
कुछ चाहत मन में उठती है उसे अहसासों में बयान कर जाती हूँ 
जो मैं जी नहीं पायी हकीक़त में उसे इन पन्नों पर लिख जाती हूँ
पहुंचे नहीं वहां तुम जहाँ पर मेरा ठिकाना था 
अहसास ए समंदर में आते तो डूब जाना था
एक अजनबी को हमने पलकों पर बिठाया इस कदर 
उतर कर दिल में वो मेरे मेरी आँखों का पानी ले गया

दास्तान दर्द की सुनना भी अजब सुनाना भी अजब 
मेरी दर्द ए दास्ताँ की वो जालिम सारी कहानी ले गया

मौत हमको आती नहीं वो मेरी जिंदगानी ले गया 
मेरे खामोश प्यार की वो हर एक निशानी ले गया.

Monday, November 5, 2012

किसी की रूह में उतर जाने का अंदाज जरा भी आता नहीं हमें
कर गैरों संग वफ़ा अपनों संग बेवफाई निभाना भाता नहीं हमें 


अहसासों के जहाँ में उतरना सिखाया नहीं किसी ने 
टूट कर अपनी चाहत को कभी निभाया नहीं किसी ने
जिंदगी होती जा रही है मेरी हादसों के नाम 
इन तल्ख़ अंदाज हादसों से उबारे मुझे कोई 

कश्ती डूबती ही जा रही मेरी बीच मझधार में 
इंतज़ार है कश्ती संग लगा दे किनारे मुझे कोई

चाहत में जिसकी हमने उम्र तमाम गुज़ार दी 
छोड़ गैरों के चल दिया आज सहारे मुझे कोई
तुम जियो अपने उसूल और हम जियें अपने उसूल
किसी को अपने उसूलों पर चलाने की हम हिमाकत नहीं करते

अनजाना राही भी गर कहता है प्यार के दो मीठे बोल 
सर राह चलते चलते किसी की हम  मुखालिफत नहीं करते 

जब तक सह सकते हैं बस चुप रह सहते जाते हैं 
पानी सर से गुज़र जाए तो हम शराफत नहीं करते 

खुदगर्ज़ हमें कहता है यह जालिम जमाना बार बार 
हम चलते चले जाते हैं अपनी राह शिकायत नहीं करते..

Sunday, November 4, 2012

हुनरमंद अपने हुनर को गाया नहीं करते 
मौका पड़ने पर हुनर को जाया नहीं करते

Saturday, November 3, 2012


दर्द का क्या ज़माने ने दर्द दिए मुझे हज़ार
जब अपनों ने दर्द दिया तो असल चोट खाई


सरापा सर चढ़ कर बोलने लगा है कलम का
क्या करूँ........ दवात खाली होने को है मेरी

मेरे नाम के चर्चे अब करने लगा है जमाना
मेरी शोहरत का अंदाजा मुझे अब होने लगा है

रेत बंद मुठ्ठी में कभी टिक नहीं सकता
वक़्त किसी के लिए कभी रुक नहीं सकता

तमन्नाओं पर अगर लगाम कसने लगूं
कहीं ऐसा ना हो मैं खुद को ही खो बैठूं

ज़माने का क्या इसका तो काम है आजमाना
हर हुनरमंद को इसने तो सीखा दोषी ठहराना

जिन रास्तों से गुजरने की मुझे चाह ना थी कभी
आज उसी राह गुज़र .....पर मैं गुजर गया

आज मैं अपनी मेहनत से एक पायदान और चढ़ गया
आम से ख़ास होने के लिए एक कदम और बढ़ गया.

वो अनमोल पल होंगे जब तुम मेरे पहलु में आओगे
जलते हुई शमाँ को जब तुम अपने हाथो से बुझाओगे

जिंदगी का क्या मेरी जिंदगी ने तो गम झेले हज़ार
जिंदगी जी ली मैंने चंद लम्हों में जब मिला मुझे अपनों का प्यार

मजहब के दायरों से ऊपर उठ चुकी हूँ मैं
जिन्दा हूँ तो तेरे लिए मरूंगी तो तेरे लिए


सवाल पूछना और जबाब गुनना फितरत है आदमीयत की
आज मैंने भी उससे सवाल पर सवालात की झड़ी लगा कर देखी

वक़्त बेरहम है बहुत याद रख
कब किस तरफ करवट रुख बदले पहचानना मुश्किल 

रुसवा जमाना हुआ हम से तो कोई गम ना हुआ
आज कोई अपना रुसवा होकर तो दिल टूट गया
जुबान खामोश हो औए शब्द बोलते से लगें 
लगता है नशा तुम्हारा अब मुझ पर तारी है
मेरी वापसी की यारा तू राह मत तकना 
मैं मुड़कर आती नहीं जिस राह से गुज़र जाती हूँ...
याद रखना भी तुम्हे मुश्किल है मुश्किल भूल जाना भी
न मिलती हो तो मर्ज़ मेरा जो मिल जाओ दवा तुम ही

आज फिर छलकने लगा उसकी यादों का पैमाना
याद आने लगा उसकी नज़रों से नज़रें मिलाना
वो घबराना शर्माना वो उसका थोडा सा सकुचाना
वो कनखियों से देखना वो नज़रें मिलने से बचाना
याद आ रहा वो पहली मुलाक़ात का पहला नजराना
किसी को टूट कर चाहना
किसी की चाहत में टूट जाना
किसी के ख्वाबों को लूट लेना
किसी की नींद में लुट जाना
किसी भटके हुए मुसाफिर को
मंजिल का पाता मिल जाना
रंग भरी इस हसीं महफ़िल में
कुछ खोये खोये से नज़र आना
लगता है तुम पर ए दोस्त
चाहत का नशा होने लगा है
 
हम वक़्त को बदलने चले थे वक़्त ने हमारे हालात बदल डाले 
कुछ सवाल उठते हैं जहन में क्यूँ वक़्त ने हमारे ख्वाब बदल डाले
आज चाँद का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहेगा 
आज के दिन एक अलग ही खुमार रहेगा 
यूँ तो रोज ही चाँद को हम देखा करते हैं 
मगर आज का चाँद बहुत ही ख़ास रहेगा
आज मेरे अपने ही मुझे आजमाते क्यों हैं 
वफ़ा गैरों संग और मुझसे बेवफाई निभाते क्यों हैं 
मैंने तो आस छोड़ दी अब कोई मेरे साथ भी आये 
साथ का दिखावा मुझसे ही कर मुझे सताते क्यों हैं 
छींटाकशी आम है करना किसी की आबरू पर 
मुझ पर तानो की बौछार से लोग मुझे चिढाते क्यूँ हैं 
अब तो तमन्ना नहीं के जनाजा किसी अपने के काँधे हो 
तानाकशी करके मेरे कथित अपने मुझे रुलाते क्यों हैं 
वो हमारी हरकतों को नादानियां समझ माफ़ करते गए 
हम गुस्ताख थे बहुत हमारी गुस्ताखियाँ कम ना हुईं
माना थोडा नादान हो तजुर्बेकार नहीं हो 
पर तुम बन्दे हो काम के बेकार नहीं हो
उदास रहना मेरी फितरत में नहीं 
मैं तो कहकहे लगाने की आदि हूँ