Sunday, December 30, 2012

मुझे खोकर मुझे ही हर पल तलाश करती है
मेरी जिंदगी की नादानियां कम ना हुई यार 
कितनी भीड़ यहाँ लगी है यारो कितने लोगों का मेला है
पहचान किसी को नहीं किसी की हर कोई यहाँ अकेला है 
आज फिर से चली वही पुरवाई है

महक मेरे महबूब की ये लेकर आई है 
मेरे पाँव बड़े उन्मादी हो गए

जिस रास्ते पर जाना ना था

वहीँ जाने के आदि हो गए

मेरे पाँव बड़े उन्मादी हो गए 

Friday, December 21, 2012

ख्वाब बेच डाले हकीकत की तो बात ना कर
सौदा है महंगा बहुत सपनो से मुलाक़ात ना कर 
संजोये थे जो पल साथ साथ आँधियों में ढह गए 
ख़्वाब सारे टूट कर मेरे कतरा ए लहू बन बह गए
सपनो की दुनिया में मेरा आना जाना था 
मेरी हर नींद का ही ये किस्सा पुराना था 
सिर्फ रोने भर से कभी सूकून नहीं मिलता 
हिम्मत जुटाए बिना नहीं मिलती सफलता
आने वाले कल की मुकम्मल योजना बनाइये 
जो बीत चुका है उससे सबक सीख जाइए
संघर्ष करो ,ज़िंदा रहो ,डट कर सामना करो 
हार की शर्मिंदगी से होगा कुछ नहीं हासिल
तन्हाई में इंसान बिखर जाता है 
आइये चंद पल साथ मुस्कराइए 
कुर्सियों पर काबिज लोग कुर्सियां ही बोते हैं 
पुश्तैनी विरासत हैं हमारे देश की कुर्सियां .
हमें बदलते मौसम के हिसाब से जीना नहीं आता 
मौसम ए मिजाज को बदलने का करीना नहीं आता 

यूँ तो बदल जाते हैं मंजर तमाम रात दिन सुबह शाम 
हर मंजर के हिसाब से मौजों का सफीना नहीं आता 
बेटा कर रहा है आज बाप से हिसाब 
गिरेबान ही बचा है आप इसे बचाइये 

बूढ़े माँ बाप बोझ बन जाते हैं बच्चों पर कभी कभी 
जीवन के कडुवे सच को समय रहते समझ जाइए 

पूत के पाँव को पालने में संवारिये 
निकला नहीं समय नैतिकता का पाठ पढ़ाइये

भटकने से कुछ भी नहीं होता है हासिल 
मंजिल को पहले से ही तय कराइए

झुग्गियों में भी ज्ञान की दस्तक जरूरी है
बस्तियों के बच्चो को भी शिक्षा का हक़ दिलाइये
जमीर जिसका बचा ना हो वो ज़िंदा नहीं महक 
कब्रिस्तानो पर यूँ हक़ की गुंजाइश ठीक नहीं 

कद ऊंचा कर लो अपने कुछ अच्छे कर्मों से 
पर यूँ इंच इंच कर कब्र की पैमाइश ठीक नहीं 

वक़्त के तकाजे को समझो बटोर लो हिम्मत 
जो मुनासिब ना हो उसकी आजमाइश ठीक नहीं 

ना करो रस्म ए अदाएगी मुकम्मल काम करो 
कुछ कर के दिखावे की हो रही नुमाइश ठीक नहीं .
जिनको खिला खिला कर हमने पाला था 
आज उन अपनों ने ही हमसे मुंह मोड़ लिया 

जिनके घावों पर हम मरहम लगाया करते थे 
आज उन्होंने ही हमारे अरमानो को तोड़ दिया
सारी स्याही सारे जज़्बात हमने उड़ेल डाले 
तुमने ख़त हमारे बिन पढ़े ही फाड़ डाले
अरमानो से संजोया था जिन यादों को 
आज तुमने अहसास सारे उधेड़ डाले
...

Thursday, December 20, 2012

आम के पेड़ों पर कोयाल जब मीठी तान छेड़ जाती है 
मन में दबे भाव बाहर आने को मचल मचल जाते हैं
बेटा कर रहा है आज बाप से हिसाब 
गिरेबान ही बचा है आप इसे बचाइये 

बूढ़े माँ बाप बोझ बन जाते हैं बच्चों पर कभी कभी 
जीवन के कडुवे सच को समय रहते समझ जाइए 

पूत के पाँव को पालने में संवारिये 
निकला नहीं समय नैतिकता का पाठ पढ़ाइये

भटकने से कुछ भी नहीं होता है हासिल 
मंजिल को पहले से ही तय कराइए

झुग्गियों में भी ज्ञान की दस्तक जरूरी है
बस्तियों के बच्चो को भी शिक्षा का हक़ दिलाइये
साड़ियाँ अब हो गयीं रुमाल 
वक़्त ने किया कितना कंगाल 
रोज आंसुओं में उमड़ी है 
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा 
संकल्पों से बहुत लड़ी है 
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा 
भावों में जो उलझी गहरी 
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा 
सैलाबों में ठहरी ठहरी 
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा 
मन में अंतर्द्वंद उठे जब 
लिख लिख कर फाड़ी वो पीड़ा 
ना आह की ना चाह की 
बस लिख लिख कर फाड़ी पीड़ा ...

Tuesday, December 18, 2012

जो बुनियाद है मजबूत तो फिकर की कोई बात नहीं 
आओ मिलकर अपनी ख्वाहिशों का परचम लहरायें
बहुत मुश्किल से मिलते हैं चाहने वाले 
हम खुश नसीब हैं जो हमको दिलदार मिला 
यूँ तो हमने बहुतों से दिल्लगी की है मगर 
किस्मत वाले हैं जो हमको तुम्हारा प्यार मिला
यूँ तो ईट का जबाब पत्थर से देने का शौक है हमें 
पर तुझे तड़पाने को तीन ही लफ्ज़ काफी है मेरे
चाहा तो बहुत खुद की जिंदगी में झांकना 
मेरी जिंदगी ने मुझे कभी फुर्सत ना दी या
अपने शेर दोहराकर खुद वाह वाह कर लेते हैं हम 
अपनी तन्हाई में यूँ ही महफ़िलें सज़ा लेते हैं हम
अपने किस्सों की किताब छपवा के रख ले सिराहने अपने 
फिर अपने हिसाब से हर किस्से को ख़्वाबों में देखा करना
निभाना ना था जिस रिश्ते को उसे आजमाते क्यूँ हो 
यादों के साए में में जी नहीं सकते तो यादों में आते क्यूँ हो 
सुन्दर नारी तरस रही दर्पण को 
प्यासे अधर तरस रहे चुम्बन को 
मन हो रहा है रेगिस्तान 
कैसे भीगे तरस रही सावन को.
ख़्वाब ऐसे पालिए जो कभी ना कभी पूरे हो जाएँ 
धरती पर उतर आये माहताब और बाहों में खो जाए.
रहती हूँ पास समंदर के पर फिर भी हूँ प्यासी 
बूँद बूँद सी इस जिंदगी से जाती नहीं उदासी 
आओ हम अपनी ही दुनिया में गुम हो जाए 
भूल जाएँ सुध बुध सबकी एक दूजे में खो जाएँ
सागर का ये गाँव है जिसमें हूँ मैं उदास 
नहीं भागीरथ पास मेरे गंगा कहाँ से लाऊं 
बस एक वचन के फेर में पड़ गए दशरथ राज 
कैकई पड़ी फेर में कैसे पुत्र को पहनाये ताज 
मैला मन बहरूपियों का पहचान कैसे हो 
नकली चेहरों के बीच असल पर हम मेहरबान कैसे हों
ख़्वाबों खयालो की दुनिया में ना रहो इस कदर 
अपनी तन्हाई को हमसे मुलाक़ात कराकर देखो.
मेरी आज़ादी को हदों में ना बांधो इस कदर 
उड़ता परिंदा हूँ परों को ना काटो इस कदर 

Sunday, December 16, 2012

अपने शेर दोहराकर खुद वाह वाह कर लेते हैं हम 
अपनी तन्हाई में यूँ ही महफ़िलें सज़ा लेते हैं हम

अपने किस्सों की किताब छपवा के रख ले सिराहने अपने 
फिर अपने हिसाब से हर किस्से को ख़्वाबों में देखा करना
मद भरे ये नैन और अधर खिले गुलाब 
तराशा हो जिसे फुर्सत से तुम हो ऐसा माहताब 
रुख को यूँ परदे में ना छुपाया करो ए नूर ए नज़र 
तेरी एक झलक पाने को हम हो जाते हैं बेताब 

Friday, December 14, 2012

जिंदगी में सच्चे रिश्तों गर पहचान हो जाए 
ये जिंदगी सदा के लिए उन रिश्तों के नाम हो जाए
कितना मतलबी इंसान है रिश्तों को भूल जाता है 
काम निकल जाने पर अपनों से मुंह फिरा कर जाता है
बस एक फुर्सत की शाम होगी और जीवन तेरे नाम होगा 
लबों पर होगी खामोशी और आँखों आँखों में काम होगा 
कुछ तुम अपने मन की कहना कुछ मैं अपने दिल की कह जाउंगी 
कुछ पल की खुशियाँ पाकर मैं जन्मों जन्मों की ख़ुशी पा जाउंगी 

बस एक फुर्सत की शाम
ये राजनीति का दंगल है या रावान की लंका 
तहस नहस करने को हनुमान जी आ जाओ 
कितने ही रावन घूम रहे हैं दस से ज्यादा सीस लिए 
इन्हें जड़ से ख़तम करने को राम जी आ जाओ 
मैं ऐसा ख़्वाब सुनहरा हूँ 
पराम्पाराओ का पहरा हूँ 
अपनी सीमाओं में ठहरा हूँ 
मैं ऐसा ख़्वाब सुनहरा
हूँ.
आज उसने मेरे ख़त का जबाब भेजा है 
आज उसने बीते लम्हों का हिसाब भेजा है 
कहकर एक हादसा भुला रहा है वो मुझको 
आज उसने मेरी धडकनों का हिसाब भेजा है
आजकल हम जल्दी ही बिस्तर पर जाने लगे 
ख़्वाबों को दुनिया को हम भी आजमाने लगे 

दिन उसके साथ में काटा और रात उसके ख़्वाबों में 
हाल ऐसा हुआ एक दूजे के संग पहरों बिताने लगे 

सोते जागते बस उसी की तस्वीर रहती है सामने
अब आईने में भी हमें उनके अक्स नज़र आने लगे

सपना टूटा तो समझ आया अपने फितूर का फलसफा
दोस्तों लम्बी सर्द रातो को हम नींद से घबराने लगे .

Thursday, December 13, 2012

सोये इंसान का जमीर जगा कर देखो 
पानी में आग लगा कर देखो 
चिंगारी एक ही काफी है लौ जलाने के लिए 
एक दिया जलने की देर है कई दिए जल सकते हैं 
गुजारिश यही है बस एक दिया जला कर देखो 
बताओ कैसे झुठला दूँ तुम्हारा वजूद मैं 
चन्दा से बन आते हो तुम चांदनी में नहला जाते हो 
सूरज से बन आते हो तुम किरणों से निखार जाते हो 
सही गलत जब समझाते हो पथ प्रदर्शक बन जाते हो 
दोस्त बन निभाते हो साथ तो मन मीत बन जाते हो 
बताओ कैसे झुठला दूँ तुम्हारा वजूद मैं 
मानते हैं आपको एक कोहिनूर हम फ़क़त आपकी कितनी इबादत है हमें 
मुड़ कर नहीं देखा कभी हमारी और जाना तो होता कितनी जरूरत है हमें 

तुम्हारी यादों की बस्तियां भी उजड़ गयीं हैं हमारी किस्मत की आँधियों में
रूठा हुआ सा मुहब्बत का हर वाकया क्यूँ यही खुदा से शिकायत है हमें

तुम पास थे तो अहसास नहीं था खुद के जूनून ए इश्क पर हमें 
दूर हुए जो तुम हमने जाना तुम्हें पाने की कितनी रगवत है हमें 

हमसाया बन कर तेरे

 साथ चलने के सपने हमने थे देख डाले
नींद खुली और टूटा जो सपना अब खुद के साए से भी नफरत है हमें

तुम्हें मिला जो तुम उसमें खुश हो , तुम्हारी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी है
ना चाह कर भी जी रहे हैं फासलों में ,तुमसे इतनी मुहब्बत है हमें

नसीब में जो लिखा ही नहीं था उसी को खुदा से थी मैं मांग बैठी
जनाज़े को जो मिल जाए कान्धा समझ लेंगे मिल गयी जन्नत है हमें
अजनबी माहताब हो तुम मेरी रूह को छू लेते हो 
बिखर जाती हूँ मैं ख्यालों में भी तेरा अहसास पाकर
बिखेर चांदनी अपनी मेरे तन को चूम लेते हो तुम 
सिमट जाती हूँ मैं ख्वाबों में भी तेरे नज़दीक आकर
तेरा ये दीवानगी मुझे मजबूर किये देती है 
जाना चाहूँ मैं दूर मगर ये पास खींच लेती है 
मुझमें तेरे होने का मुझे यूँ अहसास है 
दूर होकर भी तू मुझसे सदा ही मेरे पास है
जख्म हरा है इलाज की सलाह देते हैं 
जो नासूर बन गया तो लाइलाज होगा 
चेहरे पर हसीं मुस्कान तो खिलाओ किसी दिन 
बाहों में मेरी आकर के सिमट जाओ किसी दिन

उमंगें अब मेरी होने लगीं हैं जवान
प्रेम की मधुर तान छेड़ जाओ किसी दिन 


तड़प रहा हूँ मैं मन में लिए तेरे दरस की आस 
बहुत हुई दिल्लगी अब तरस खाओ किसी दिन 

गिले शिकवे कर निकाल लेना तुम भड़ास
जितना चाहे आकर मुझे सताओ किसी दिन

दिल की गहराइयों से तुम्हें अपना मान चुका हूँ
मुझको अपना मान दिल की लगी बुझाओ किसी दिन

ख़त्म ना हो तेरी मेरी मुलाकातों का सिलसिला
दौर ए मुलाक़ात की शुरुआत कर जाओ किसी दिन

कहते हैं अजनबी आपस में घुल मिल नहीं पाते
फुर्सत में बैठ हमको भी आजमाओ किसी दिन .
संभाल ले यूँ धड़कने अपनी बेकाबू ना कर 
मौत के आने से पहले ही यूँ बेमौत ना मर
आज से मौन व्रत धारण कर लिया मैंने 
खामोशी में बड़ी ताकत है सुना है मैंने
लिख लिख कर नाम उसका क्यूँ मिटा देते हो तुम 
अपने जज्बातों को क्यूँ इस कदर भिगा देते हो तुम 
हम राह से गुजरे जहां तेरा आशियाँ था 
पर निशाँ छोडना अपने मुनासिब ना था 

Sunday, December 9, 2012

आज मेरी नादानी , से मच गया बबाल 
एक ने कहा फ़रिश्ते , दूसरे ने दलाल.
अपने अहसास कलम में ढाल मोतियों सा टांक दें 
महज लफ्जों में कही बात दिल छुआ नहीं करती 

जो लिख रहे हो उसी में खुद को जी कर देखो 
अहसासों बिना हों शब्द तो ग़ज़ल नहीं बनती 
सिर्फ मुखड़े को देख कर ही ना पूरी ग़ज़ल भांप लीजिये 
बस एक बार तो पूरी ग़ज़ल पर नज़रें करम कीजिये
मुस्कराहटें ग़मों को कुछ देर भुला देती हैं 
दर्द ए दिल को कुछ देर सबसे छुपा देती हैं
तुम्हें मिला जो तुम उसमें खुश हो , तुम्हारी ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है 
ना चाह कर भी जी रहे हैं फासलों में , के तुमसे इतनी मुहब्बत है हमें
ना कोई मंजिल ना कोई ठिकाना जो मिला वो बस उसी में खुश हैं 
खुला आसमान और प्राकृतिक नज़ारे वो मुफ्त में ये लुत्फ़ ले रहे हैं 

ना जिन पर घर है ना जिन पर छत है वो तल्ख़ मौसम में जी रहे हैं 
नीम का पेड़ है उनका ए सी और बारिश में शावर का मज़ा ले रहे हैं
कैसे कहें हमें फुर्सत ही नहीं होती 
और वो हमसे अपना पता पूछते हैं 
फुर्सत ए जुदाई का उठा फायदा 
तन्हाई में निभाना लिखने का कायदा 
फिर देखना हर शब्द होगा अनमोल 
दर्द ए तन्हाई में लिखी हर ग़ज़ल का ना होगा कोई मोल
सिर्फ दिल खोल कर हंसने के लिए ...
..
चर्बी इतनी चढ़ आई है हड्डियों का अब अत पता नहीं 
फेसबुक छोड़ वर्जिश अपनाऊं तो मेरी कोई खता नहीं ...अंजना चौहान
फुर्सत के पलों में बैठ हम तुझसे मुलाक़ात करेंगे 
आज हम तेरी सूरत से नहीं तेरी सीरत से मिलेंगे
थोड़ी सी मेहनत मशक्कत कर के तो देखिये 
अपने हाथों की ताकत का अंदाजा हो जाएगा 
बीच समुन्दर खड़े हैं हम पतवार टूटी है और लहरें उफान पर 
सोचती हूँ क्यों ना आज हवाओं का रुख मोड़ किनारे तक जा पहुंचूं
दो पाटों के बीच में पिस गए हम तो यार 
समधी समधी गले मिले बिचौलिया हुआ बेकार
आज सब हैं भूल चुके कुल्ल्हड़ की वो चाय 
प्याले की चाय में कुल्ल्हड़ सी मिठास ना समय 
द्रोपदी की आबरू छिन गयी दुशासन के हाथ 
पञ्च पतियों की द्रोपदी की किसी ने ना बचाई लाज
दोपहिया पर स्टंट कर रहा उम्र का उन्माद 
मौत की चिंता नहीं ना घर वालों की याद 
बिना तोड़े तो एक कोर भी मुंह तक नहीं जाएगा 
चीटी जैसी मेहनत करो तो कर्मफल मिल जाएगा .
आजकल के दौर में वह सफलता की सीढ़ी चढ़ जाता है 
बेशर्मी की हदें तोड़ जो मीठे वचन कहता जाता है
मेहनत हम कर लेते , तो आ जाता काम 
कर्मठता की एवज में, ऊँचे लेते दाम 
सवांर लो इस अतुल्य प्रकृति को ये कहीं विलुप्त ना हो जाए 
हरा भरा ये खूबसूरत नज़ारा कहीं किताबों में ही ना खो जाए 
तुम एकाकी मैं एकाकी 
क्यों ना बन जाएँ एक दूजे के साथी
कुछ तुम अपने मन की कहना 
कुछ मैं अपने मन की कह जाउंगी
हल्का हो जाएगा भारी मन
फिर तुम अपने घर और मैं अपने घर जाउंगी
अपनी तहजीब को सलीके से रख दिया संभालकर 
बहुरूपियो की दुनिया में मैंने भी मुखौटा चढ़ा लिया 
तन्हाइयों में मेरा साथ भला कोई निभाता कैसे 
भीड़ तो बहुत मिली पर किसी से दिल नहीं मिला 

जब किसी ने जख्म दिए ही नहीं तो शिकवा कैसा 
पर किसी का प्यार खुद में मुकम्मिल नहीं मिला
मैं आइना देखना ही बंद कर दूँ ,जरूरत ही क्या 
जो तुम सामने मेरे मेरी असलियत बयाँ कर दो ..
देखो हंस ना देना ....
.
अधूरा जो छोड़ा मुकाम तक पहुंचे 
मोहल्ले वालों के कान तक पहुंचे 
.

फिर देखना गली गली हमारा चर्चा ए मुहब्बत आम होगा 
हमारे जिक्र के सिवा मोहल्ले वालों को ना कोई काम होगा 
एक सूरज सा बन कर .........सूरज के तुम काम करो 
मिटा धरा पर अंधियारा ..........रौशनी के नाम करो ..
फूलों में खुशबू , मिटटी में भी सौंधापन नहीं रहा 
आपस में मिलने वालों में वो अपनापन नहीं रहा 
होश हैं गुम धड़कने थम सी गयीं 
मैं हर हाल में जीने में खुश हूँ यारों 
गम ए जुदाई सह लेते हैं हंसकर 
तन्हाई है तो पीने में खुश हूँ यारो
विकसित होने का अभी शक मत पालो लोगों 
गौर करो तुम्हारी तहजीब में दरारें कितनी हैं

महफ़िलों में खाकर जूठन प्लेटों में छोड़ने वालों 
बाहर जाकर देखो भूखों की कतारें कितनी हैं 

कल का सपना बुनने वाले लापरवाह नौजवानों 
संभल जाओ देश को तुमसे उम्मीदें कितनी हैं
हादसों पर हादसे होते जा रहे हैं रोज तमाम 
सर पर कफ़न बाँध कर निकलने लगे हैं लोग 

भागती दौड़ती ये जिंदगी हमें विरासत में नहीं मिली 
धीरे धीरे इस अजनबी माहौल में ढलने लगें हैं लोग 

सांस लेने भर की भी अब फुर्सत नहीं मिलती कभी 
बढती व्यस्तता के इस दौर में बदलने लगे हैं लोग 

अपनापन नहीं रहा और मह्त्वाकांक्षयें हैं ज्यादा 

मौका पड़ने पर ही आपस में मिलने लगे हैं लोग

मतलबी दुनिया में मतलबी होते जा रहे हैं
काम निकल जाने के बाद भूलने लगे हैं लोग 
रूह का कोई रंग नहीं होता अपना 
जो रंग उसे मिलता है नूर ए नज़र बन वो उसी में ढल जाती है