रोज आंसुओं में उमड़ी है
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
संकल्पों से बहुत लड़ी है
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
भावों में जो उलझी गहरी
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
सैलाबों में ठहरी ठहरी
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
मन में अंतर्द्वंद उठे जब
लिख लिख कर फाड़ी वो पीड़ा
ना आह की ना चाह की
बस लिख लिख कर फाड़ी पीड़ा ...
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
संकल्पों से बहुत लड़ी है
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
भावों में जो उलझी गहरी
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
सैलाबों में ठहरी ठहरी
लिख लिख कर फाड़ी जो पीड़ा
मन में अंतर्द्वंद उठे जब
लिख लिख कर फाड़ी वो पीड़ा
ना आह की ना चाह की
बस लिख लिख कर फाड़ी पीड़ा ...
No comments:
Post a Comment