Thursday, December 13, 2012

मानते हैं आपको एक कोहिनूर हम फ़क़त आपकी कितनी इबादत है हमें 
मुड़ कर नहीं देखा कभी हमारी और जाना तो होता कितनी जरूरत है हमें 

तुम्हारी यादों की बस्तियां भी उजड़ गयीं हैं हमारी किस्मत की आँधियों में
रूठा हुआ सा मुहब्बत का हर वाकया क्यूँ यही खुदा से शिकायत है हमें

तुम पास थे तो अहसास नहीं था खुद के जूनून ए इश्क पर हमें 
दूर हुए जो तुम हमने जाना तुम्हें पाने की कितनी रगवत है हमें 

हमसाया बन कर तेरे

 साथ चलने के सपने हमने थे देख डाले
नींद खुली और टूटा जो सपना अब खुद के साए से भी नफरत है हमें

तुम्हें मिला जो तुम उसमें खुश हो , तुम्हारी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी है
ना चाह कर भी जी रहे हैं फासलों में ,तुमसे इतनी मुहब्बत है हमें

नसीब में जो लिखा ही नहीं था उसी को खुदा से थी मैं मांग बैठी
जनाज़े को जो मिल जाए कान्धा समझ लेंगे मिल गयी जन्नत है हमें

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